इमाम हुसैन की कुर्बानी मिल हक़ और सच्चाई का सन्देश प्रदान करती है:जनाब अब्दुल कलाम कदौरा
कदौरा। इस्लाम धर्म में नया साल मोहर्रम से शुरू होता है। ज़िलहिजा पर ख़त्म हो जाता है मतलब इस्लामी साल का आग़ाज़ कुर्बान से होता है और कुर्बानी पर ख़त्म हो जाता है तो इस्लामी साल का आखिरी महीना को मोहर्रम का महीना कहा जाता है। इस महीने की दस तारीख को इमाम हुसैन ने मैदाने करबला में भूख प्यास को बर्दाश्त करते हुए हक़ और सच को सर बुलन्द करते हुए और अल्लाह पाक की बारगाह में सजदा करते हुए और ज़ुबान ए अक़दस पर कुरान की तिवालत करते हुए जामे शहादत नोश फरमाये थे। दस मुहर्रम को आशुरा दिन होता है। इस दिन बहुत बहुत फजीलत है। आशुरा के दिन ज्यादा से ज्यादा इबादत और कुरान पढ़ना चाहिए। हज़रत इमाम हुसैन रज़ी अल्लाहु अन्हु ने मैदाने कर्बला में अपना सर कटा दिया। मगर ज़ालिम से हरगिज़ हरगिज़ हाथ नही मिलाया। सच्चाई को उजागर किया ज़ुल्म के खिलाफ आवाज बुलंद करते रहें सच्चाई और ईमानदारी के परचम को बुलंद किया है।

इमाम हुसैन की शहादत से हम सब को यह सन्देश प्रदान होता है कि हक़ का मिनार हमेशा मज़बूती से थामे रहना चाहिए बतिल से हरगिज़ हरगिज़ सुलाह नही करनी चाहिए। उन्होंने बताया कि हमारे मुस्लिम समुदाय के लोगों को चाहिए कि मज़ीद लंगर/प्रसाद बांटे सबील और अधिक कुरान शरीफ की तिलावत करें नमाज़ की पाबंदी करते रहे। हमारे इमाम हुसैन शहादत से नमाज़ और रोज़ा की पावंदी और अच्छे काम करने बुराईयों से नफरत करने का सबक़ मिलता है। इमाम हुसैन की शहादत तमाम देश वासियों को शराब और गाली से बचने,भलाई करने एवं पर्दा को अपनाने बातिल को मिटाने और अमन भाई चारा शांति तथा प्रेम और मोहब्बत अख़ुव्वत इतिहाद सब्र शुक्र हक़ और सच्चाई इन्साफ एकता का सबक़ हासिल होता है आखिरी मे उन्होंने कहा कि किसी तरह का हगामां नही करना चाहिए समाज में शांति और अमन बनाएं रखना चाहिए आपसी प्रेम मोहब्बत को बढावा दे। मिल जुल कर एकता के साथ अमन बनाएं रखें।
फोटो परिचय। जनाब अब्दुल कलाम कदौरा