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इतिहास पर बुल्डोजर: कालपी का उरई दरवाजा मिटा, दुकानों ने ली जगह धरोहर से कारोबार तक—नगरवासियों में रोष, संरक्षण पर उठे सवाल

कालपी (जालौन)

ऐतिहासिक और पौराणिक नगरी कालपी में धरोहरों के लगातार खत्म होने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। नगर के प्रसिद्ध और भव्य उरई दरवाजे का अस्तित्व अब पूरी तरह मिट चुका है, जिसकी जगह पर आज दुकानें खड़ी हो गई हैं। इस घटना को लेकर स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश और निराशा देखने को मिल रही है।


बताया जाता है कि दो मंजिला यह विशाल दरवाजा अपने अनोखे स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता था। यह न केवल कालपी की पहचान था, बल्कि नगर के गौरवशाली अतीत का प्रतीक भी माना जाता था। चार प्रमुख दरवाजों से घिरे कालपीधाम के हाट का यह हिस्सा कभी नगर की समृद्ध विरासत की गवाही देता था, लेकिन समय के साथ तीन दरवाजे पहले ही खत्म हो चुके थे और अब चौथा भी इतिहास बन गया।

स्थानीय लोगों के अनुसार, तत्कालीन प्रशासन द्वारा इस दरवाजे को जर्जर बताकर गिराया गया था। उस समय आश्वासन दिया गया था कि पुराने स्वरूप और नक्काशी के साथ इसका पुनर्निर्माण कराया जाएगा। लेकिन यह वादा पूरा नहीं हुआ और अब उस स्थान पर व्यावसायिक दुकानों का निर्माण करा दिया गया है।

नीलाभ शुक्ला, कन्हैया गुप्ता, राजू पाठक, पवन, दीपक, शिवम, अवधेश, बबलू आदि दर्जनों नगरवासियों का आरोप है कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने नगरपालिका की मिलीभगत से इस ऐतिहासिक स्थल पर कब्जा कर लिया। उनका कहना है कि प्रशासन की अनदेखी और ढिलाई के चलते एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट कर दिया गया।

नगरवासियों ने सवाल उठाए हैं कि जब सरकार द्वारा सार्वजनिक और ऐतिहासिक भूमि पर अतिक्रमण रोकने के सख्त निर्देश दिए जाते हैं, तो इस मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

इस घटना को कालपी की सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ा नुकसान माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि इतिहास का जीवंत हिस्सा था, जिसकी अनदेखी कर उसे खत्म कर दिया गया।

स्थानीय बुद्धिजीवियों और सामाजिक संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि नगर की बची हुई ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोहराई न जा सकें।

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