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कर्बला के शहीदों की याद में नेक अमल करें, गरीबों और मजलूमों की मदद करें : हाफिज इरशाद अशरफी


मुहर्रम में इबादत, रोजा और फातिहा का एहतिमाम करें, शरीयत के खिलाफ कार्यों से बचें : मुफ्ती तारिक बरकाती

कालपी (जालौन), 24 जून। इस्लामी नववर्ष के पहले महीने मुहर्रम उल हराम की अहमियत और कर्बला के शहीदों की कुर्बानियों को याद करते हुए दारुल उलूम गौसिया मजीदिया के नाज़िम-ए-आला अल्हाज हाफिज इरशाद अशरफी ने लोगों से नेक अमल करने तथा गरीबों और मजलूमों की मदद करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस्लामी साल का आगाज भी कुर्बानी से होता है और समापन भी कुर्बानी के संदेश के साथ होता है। मुहर्रम की 10 तारीख को मैदान-ए-कर्बला में हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने दीन-ए-मुहम्मदी की हिफाजत के लिए अपनी जानें कुर्बान कर दीं और पूरी दुनिया को यह पैगाम दिया कि हक और इंसाफ की राह में कभी जुल्म और बातिल के सामने झुकना नहीं चाहिए।

हाफिज इरशाद अशरफी ने कहा कि अल्लाह का बड़ा करम है कि उसने उम्मत को मुहर्रम जैसा अजीम महीना अता फरमाया। हजरत इमाम हुसैन ने अपने नाना हजरत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दीन को बचाने के लिए अपने घर वालों और साथियों सहित शहादत स्वीकार की, जो इंसानियत के लिए हमेशा एक मिसाल बनी रहेगी।

वहीं दारुल उलूम गौसिया मजीदिया के प्रिंसिपल मुफ्ती तारिक बरकाती ने कहा कि कर्बला वालों की शहादत को ऐसे अंदाज में याद किया जाना चाहिए जो इस्लाम और शरीयत की शिक्षाओं के अनुरूप हो। उन्होंने कहा कि आशूरा के दिन अधिक से अधिक इबादत करनी चाहिए, रोजा रखना चाहिए तथा फातिहा का एहतिमाम करना चाहिए। उन्होंने बताया कि 10 मुहर्रम को नमाज-ए-आशूरा सूर्योदय के बाद से सूर्यास्त तक किसी भी समय अदा की जा सकती है।

उन्होंने कहा कि मुहर्रम का महीना त्याग, सब्र, इंसाफ और इंसानियत की खिदमत का पैगाम देता है। ऐसे में कर्बला के शहीदों की याद में जरूरतमंदों की सहायता करना, नेक काम करना और समाज में भाईचारा व इंसानियत का संदेश फैलाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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